हक न तो माटी उठाना
हक न तो माटी उठाना न कोई धूल,
तोड़ने है हमें चुभते बबूल-फल।
चढ़े पहाड़ तो नज़रे आसमाँ पे हो,
पर जमीं के पथरो को भी न भूल।
जिंदगी झील में है डूबी चाँद सी,
उठा उसे और उसके झूले पे झूल।
नहीं चमकती बिजुरिया हमेशा ऊपर,
अंदर के डर को दे न इतना तूल।
मिली ऐसी सजा आसमाँ के पुल को,
मनमानी हवा में आहिस्ता रहा धुल।
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