Saturday, 18 January 2020

#New Kavita 4

हक  न  तो  माटी  उठाना

हक  न  तो  माटी  उठाना  न  कोई  धूल,
तोड़ने  है  हमें  चुभते  बबूल-फल। 

चढ़े  पहाड़  तो  नज़रे  आसमाँ  पे  हो,
पर जमीं  के  पथरो  को भी  न  भूल। 

जिंदगी झील  में  है  डूबी  चाँद  सी,
उठा  उसे  और  उसके  झूले  पे झूल। 

नहीं चमकती बिजुरिया  हमेशा  ऊपर,
अंदर  के  डर को  दे  न  इतना  तूल। 

मिली  ऐसी  सजा  आसमाँ  के पुल को,
मनमानी  हवा  में  आहिस्ता  रहा  धुल। 

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