Saturday, 1 February 2020

#new kavita 5

देख  लिए  हैं  हमने  तारे।

देख  लिए  हैं  हमने  तारे 
चलकर  शत-शत  योजन,
धरा  पर  कितने  युधिठिर  है 
नभ  में  कितने  धुयोंधन।

राजता  नग-शुग  यहाँ  पर 
हो  ज्यों  ऊध्वर्  अंगुल-आश,
अवतार  पुन: जगतारन  हेतु 
धरा  कृष्ण  ने  धर्म-आकाश।

ध्वस्त  यग  के  अवशेषों  में 
परवाह  किसे  है रीती  की,
सर्पों  के कषक  शल्कों  में  ही 
ढूढ़  रहे  कण  प्रीति  की। 

कौशल  से  शंख-व्यूह  को  भेद 
नीकलती  फुंक, कर  जय- नाद,
आता  ज्यों  नवांकुर  श्रीत  में,
भंग  पट  लेने  जीवन- स्वाद। 

किस रथ  को  हैं  हम  हांक  रहे 
हस  रहे  जल- थल- नभ- दलदल,
डूब  रहा  दिनमान  क्षितिज  का 
हो  रहा  धनतर  तम  पल-पल। 

रख  दिए  हैं  हमने  चौराहे  पर 
घर  पर  जला, कुछ  और  दिए ,
न  मृत  हों  पवन- छल  से 
शिखाये बिन  जी  भर  जीये। 

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