Monday, 3 February 2020
Saturday, 1 February 2020
#new kavita 5
देख लिए हैं हमने तारे।
देख लिए हैं हमने तारे
चलकर शत-शत योजन,
धरा पर कितने युधिठिर है
नभ में कितने धुयोंधन।
राजता नग-शुग यहाँ पर
हो ज्यों ऊध्वर् अंगुल-आश,
अवतार पुन: जगतारन हेतु
धरा कृष्ण ने धर्म-आकाश।
ध्वस्त यग के अवशेषों में
परवाह किसे है रीती की,
सर्पों के कषक शल्कों में ही
ढूढ़ रहे कण प्रीति की।
कौशल से शंख-व्यूह को भेद
नीकलती फुंक, कर जय- नाद,
आता ज्यों नवांकुर श्रीत में,
भंग पट लेने जीवन- स्वाद।
किस रथ को हैं हम हांक रहे
हस रहे जल- थल- नभ- दलदल,
डूब रहा दिनमान क्षितिज का
हो रहा धनतर तम पल-पल।
रख दिए हैं हमने चौराहे पर
घर पर जला, कुछ और दिए ,
न मृत हों पवन- छल से
शिखाये बिन जी भर जीये।
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