kya halat aaj ke
क्या हालात आज के किसको खबर नहीं,
अकड़े हैं बर्फ-से कोई रबर नहीं।
जल रहे जमीं पे ख्वाइशों के ढेर,
चोटी पे बैठे को आतिश नहीं।
चीखती है बेटियाँ अधेर रात-गुफा मे,
मैखाने के नशेड़ियों में कोई गदर नहीं।
लाशों पे रक्स गीध का देखते निजाम,
फर्ज पे मरनेवालों की कोई कदर नहीं।
मायूस सी पड़ी हैं चटानों पे शबनम,
चाहे वो उठ जाना उसे और सबर नहीं।
तेरे दिन हुए पुरे ओ जालिम सितमगर,
हाथी भी चीटियों के खौफ से जबर नहीं।
नियत ही चोट में है निकले क्या बहर से,
वो जहर ही आया कोई अमर नहीं।
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