मेरी प्रार्थना का हर शब्द
हे ईश्वर।मेरी प्रार्थना का हर शब्द
अर्जुन के मत्स्यायभेदी तीर सा
आप तक पहुँचे
उध्वर्मुखी यज शिखाओं-से
मेरी विचार गगन चूमें
परांगमुखी मेरी आकंछाए
चक्रवात सा मेरे ईद-गिद रहें।
हे कलुषशोधक।
मेरे निचे जाती वासनायें
आपके दयाद्र कठोर तल से टकरा
गेंद की तरह नभगामी हो
वृक्षवासी पक्षी की तरह
ऊंचाई पर ही रहे
मेरी भावनाएँ।
हे अणु-अणु के हिदयवासि।
पलकों से झरे आँसू तो नहीं जुड़ते
फिर पलकों से
पर जल-बूंदे मिलती हैं परस्पर
होता है अस्तित्व का विस्तार
बोध-स्फीति के साथ
कुछ ऐसा ही घटित हो
मेरे ऊपर।
हे परमात्मन।
रवे की तरह मेरे हर फलक गढ़ने वाले
मुझे ऐसे गढ़े कि
आपकी रश्मियों की बिसात को
छन-छन कण-कण
कर सकूँ आत्मसात।
हे पेरमात्मन।
आपने आशीष के ओस
इस जड़ शिला पर भी गिराये
द्रवित हो मैं
बहना चाहता हूँ आपकी ओर
बस आईने में अपनी प्रतिबिम्ब सा
आपको ताकता एकटक
आपकी राह में
रहना चाहता हूँ।
हे दसो दिशाओं के मिलान बिंदू।
व्यापक व्योम में फैले
मेरे गुंजायमान अस्थिरता
इसी बिन्दु पर स्थिर हो
बस समाया रहू
तुम्हारे रचे इस सिन्धु में
न रहे कुछ विशेष
न रहे कुछ शेष।
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