सुनहरे ख़्वाबों में कभी
सुनहरे ख़्वाबों में कभी,
लग जाती है रगीन दिये से आग
लोग पालते हैं
बुझा देने का हौसला
आँखों के गरम पानी से ही
मत पूछो जवानी के
दर्द-ओ-गम
हाथ खाली है फकत तग़ाली हैं
हम दे रहे हैं इम्तेहाँ
अंदर के तूफां बांधने का
उफनते समंदर को
टूटे पथरो से साधने का
देख रहे हैं किस्म
आतिश में तड़प रहे हैं जवाबी
हमारे रूह और जिस्म।
छूट रहे हैं रंगे तलवारों के रंग
बस लोहा ही दिख रहा
धारो पर बेजग
सख्त फौलाद को पकड़
सख्ती से जुड़ा है
नरम मूठ
खत्म कर देगी हमारी शमसीर
ज़ुल्म ओ सितम ढाते शैतान
और उसके
बेहरम झूठ
जैसे पानी में डूबे सर को
साँस के लिए रहती है
सिर्फ बाहर आने की छटपटाहट
हमारी मंजिल भी एक ही हुई है
फना हो बर्बादी
सब कुछ भूलकर
बुनियाद हिलाने वाले
हालात से आजादी।

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