सुरासुरी लोपित कर माँ
असुर-सुर काँपा रहे आकाश व धरती,
जगा तव वीणा-तार हे महासरस्वस्ती।
निरंकुश वे दे रहे तान आसुरी कर्कश,
छोड़े यह तीर घाटी घोर धनु-तरकश।
तसम सुरसा-मुख स्फीत है अज्ञान का,
जोत जुगनू सा नहीं दिखता वैज्ञान का
हम तव तृषित पुत्र माँ कर दे सुधापान,
दे तव छाया-छत्र माँ कर दे अंकदान।
हो विमल अचरण तव धरे रहे चरण,
सपदा विगमक की हो माँ वरण।

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